महिला दिवस पर सिर्फ एक दिन महिलाओं का सम्मान क्यों


धाकड़ खबर | 19 Jun 2019

पूरे विश्व में 8 मार्च को अंतराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की तैयारियां हो चुकी हैं, इसकी शुरुआत 1908 से न्यूयार्क में हुई। 1911 में जब इसे कई देशों में मनाया गया था अगर हम तब से देखें तो 8 मार्च 2019 को ये 108वां अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है। हमारे यहाँ महिलाओं के लिए कहा गया है कि “यस्य पुज्यते नर्यस्तू तत्र रमंते देवता“ अर्थात् जहाँ नारी की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं, हमारे समाज में नारी को पूज्यनीय और वंदनीय माना जाता है। नारी के बारे में कहा जाता है कि नारी प्रेम, स्नेह, करुणा और मातृत्व की प्रतिमूर्ति है। देखा जाय तो बिना नारी के सृष्टि की कल्पना भी नहीं कर सकते। फिर भी हमें नारी को सम्मान देने के लिए दिवस मनाना पड़ता है। वर्तमान में भी वर्ष के सिर्फ एक दिन 8 मार्च को ही हम महिलाओं को सम्मान, प्यार, सत्कार का हकदार समझते हैं बाकी दिन क्यो नही। देखा जाता है कि लोग महिलाओं के बारे में तो इस दिन लोग बड़ी बडी बातें करते हैं लेकिन अगले ही पल या दिन महिलाओं के प्रति पुरूषों की वही पुरानी धकीयानूसी सोच जाहिर होने लगती है। 8 मार्च को महिला सम्मान ढोग दिवस कहा जाय तो गलत न होगा। भारतीय समाज हमेशा से पुरुष प्रधान समाज रहा है, आज भी हमारे बहुतायत समाज में एक महिला जन्म से मृत्यु तक पुरुष के हाथों की कठपुतली बनी रहती है। आज भी हमारे समाज में महिलाओं की उपेक्षा होती है और परिवार से लेकर बाहर तक हर जगह उनसे अच्छे व्यवाहर की अपेक्षा भी होती है।


देखा जाय तो इक्कीसवीं सदी में महिलाओं की स्थिति में कुछ बदलाव जरूर हुआ है। इसके पीछे महिलाओं का शिक्षित होना ,घर की दहलीज से बाहर निकल कर अपने योग्यता का साबित करना भी है। आज हर जगह महिलायें अपने को साबित कर रही है। चाहे वो शिक्षा, खेल, राजनीति का क्षेत्र ही क्यो न हो। इसके बावजूद भी आज भी महिलाओं के प्रति लोगों की सोच नही बदल रही है। आज भी पुरूषों के नजर में उन्हे उपभोग या अबला ही समझा जाता है। यही वजह है कि लोगों के शिक्षित होने के बाद भी महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा से लेकर बाहरी हिंसा में कमी नही आ रही है। कोई दिन ऐसा नही होता कि महिलाओं के साथ जबरदस्ती या अभद्रता की खबरें न हों। आज भी हमारे घर परिवारों में लड़कीयों के जन्म पर उतनी खुशी नही होती जितनी की लड़कों जन्म लेने पर होती है यह साबित करता है कि कही न कही से हम आज भी उन्हे अबला समझा जाता है। लोग बच्चीयों को कोख में ही मार देते हैं। कई बार देखा जाता कि बच्चीयों के जन्म लेने के बाद उन्हे फेंक दिया जाता है। यदि हम महिलाओं का इतना ही सम्मान करते हैं तो ये घृणित काम क्यों होते हैं। महिलाओं के सम्मान की बातें तो बड़ी-बड़ी की जाती हैं लेकिन संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का विधेयक आज भी लटका पड़ा है। आज भी पुरूष महिलाओं के लिए अपनी सोच नही बदल पाये है। हमें महिला दिवस मनाने की नही सोच बदलने की जरूरत है। हम महिलाओं के अधिकार की बात तो करते हैं पर उन्हें अधिकार ना देते हैं ना किसी अधिकार का हकदार समझते हैं। आज भी हमारे समाज में महिलाएं चूल्हा चौका, बच्चे पैदा करना, घर वालों की जिम्मेदारियों को ही अपनी ज़िंदगी समझ अपना जीवन ख़तम कर देती हैं, अपनी हर इच्छाओं को मारकर पूरी उम्र उनके लिए ही जिए जाती है इस स्थित के लिए कहीं न कहीं महिलायें भी जिम्मेदार है। देखा जाता है कि महिलाये घर या आफिस में हो रहे र्दुव्यहार को सहन करती रहती है। जिसके कारण उनके साथ हो रहे र्दुव्यहार में बढोत्तरी होती जाती है यदि वे तत्काल इसका विरोध करें तों उनके साथ इस तरह के वर्ताव और भेदभाव मे निस्चित ही कमी आयेगी। महिलाओं को कानून ने इतने अधिकार दिये हैं कि यदि वे इन्हे इस्तेमाल करें तो निस्चित ही पुरूषों को उनके ताकत और सहनशीलता का पता चल जायेगा। उन्हे अपने हक के लिए आगे बढ़ना होगा और अपने प्रति हो रहे भेदभाव का खुल कर विरोध करना होगा।

महिलाओं को मौका मिले तो आज वो पुरुषों को हर क्षेत्र में बहुत पीछे छोड़ने की हिम्मत, ताकत और काबिलियत रखती हैं, देश की हर महिला अपना घर भी सम्भाल सकती है और बाहर निकल कर अपने सपने को भी पूरा कर सकती है जबकि पुरुषों के लिए दोनों कार्य एक साथ करना असंभव होता है।

महिला दिवस हम मनाते जरूर है पर अभी तक महिलाओं को वो सम्मान और अधिकार हम दे नहीं पाए जिसकी वो सच में हकदार हैं। हमें सिर्फ एक दिन महिला दिवस मना कर नारी को सम्मान देने के बजाय अपनी सोच बदलने की जरूरत है ताकि उनका हर जगह और हर दिन सम्मान हो।

 


अन्य ख़बरें

Beautiful cake stands from Ellementry

Ellementry